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हिंदी शायरी
मंजिले अपने रास्तो का पता
अकसर तब ही देती है

जब हम नाकामियों को

गिनना छोड़ देते है

कदमो को लगती है ठोकर अगर

तो दोष ज़र्रो को देते है

अपनी कमियों  को कहने वाले

लोग बहुत कम ही होते है

शायद यूही नहीं रहती जीने की आरजू

तमन्नाओ के बहलावे में अक्सर

लोग रहते है|

मंजिले अपने रास्तो का पता

अकसर तब ही देती है

जब हम नाकामियों को

गिनना छोड़ देते है|


By Nikhat Khan

आखिर माँ हो
बचपन मेरा तेरे आँचल में ,

सिमट कर बड़ा हुआ|

हर ख़ुशी मुझको मिले ये सवाल,

तेरी हर दुआओं में क्यों रहा|

माथे पे गिरे पसीने से,

पेशानी के बल छुपाती रही|

आँखों से जब ,आंसू छलक जाते थे

तो कह देती थी ,तिनका चला गया|

कितनी मासूमियत से माँ होने का हक अदा किया|

मेरी आँखों से जब भी आंसू गिरे

अपने आँचल में छुपा लिया|

मेरी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए

अपनी जरूरतों को कम किया|

आखिर माँ हो ,ममता का समंदर हो

और क्यों न हो ,तेरे क़दमों में

जन्नत होने का हक ,'खुदा' ने  ही तुझे दिया |


By Nikhat Khan

 

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